St. Stephen's College: छात्र के पीछे पड़ा मैनेजमेंट

नई दिल्ली: दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफंस कॉलेज में स्टीफंस वीकली निकालने वाले छात्र देवांश मेहता का नाम पुरस्कार की सूची से काटने के बाद अब 23 अप्रैल तक उसे कॉलेज से निलंबित कर दिया गया है। 

कॉलेज के प्रिंसिपल ने निलंबन के आदेश में कहा है कि देवांश मेहता जो बीए तृतीय वर्ष फिलासफी ऑनर्स के छात्र हैं उनको कॉलेज में बनी एक सदस्यीय समिति ने अनुशासनहीनता का दोषी पाया है। जांच समिति की रिपोर्ट कॉलेज की वेबसाइट पर डाल दी गई। तत्काल प्रभाव से देवांश मेहता को 23 अप्रैल तक कॉलेज से निलंबित किया जाता है। साथ ही उनके कॉलेज परिसर में भी आने पर रोक है।

ज्ञात हो कि 18 अप्रैल को कॉलेज में आयोजित एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल छात्रों को पुरस्कृत करेंगे। इसमें अनुशासित छात्र पुरस्कार के लिए देवांश का नाम प्रस्तावित था लेकिन उसकी जगह दूसरे छात्रा को यह पुरस्कार दिया जा रहा है। प्रिंसिपल के इस निर्णय का डीयू शिक्षक संघ और छात्रसंघ ने विरोध किया है। शिक्षक संघ की अध्यक्ष और स्टीफंस कॉलेज में प्राध्यापिका डॉ. नंदिता नारायण ने कहा कि यह किसी भी छात्र की आत्मा को मारने जैसा है। ऐसा लगता है कि कॉलेज प्रशासन छात्र के पीछे ही पड़ गया है क्योंकि पहले उसके खिलाफ जांच बैठाई गई, फिर पुरस्कार की सूची से नाम काट दिया गया और अब उसको निलंबित कर दिया गया।

देवांश को निलंबित करने का विरोध स्टीफंस के पुराने छात्रों का संगठन भी कर रहा है। स्टीफंस के पुराने छात्रों ने इस संबंध में उत्तरी जोन के विशप को पत्र लिखा है। साथ ही कॉलेज से पढ़ चुके ऐसे लोग जो आज उच्चपदों पर आसीन हैं उनसे भी मामले में हस्तक्षेप की मांग की है। इसके अलावा नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन इस मुद्दे को लेकर बृहस्पतिवार को प्रदर्शन करने जा रहा है।

पहले भी विवादों में रहे हैं प्रिंसिपल
सेंट स्टीफंस कॉलेज के प्रिंसिपल वाल्सन थंपू पहले भी विवादों में रहे हैं। डीयू शिक्षक संघ की अध्यक्ष डॉ. नंदिता नारायण के खिलाफ कार्रवाई, कॉलेज के प्रशासनिक अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई और कॉलेज में शिक्षकों की नियुक्ति में धर्म विशेष के लोगों को प्रश्रय देने सहित कॉलेज के छात्रों को प्रतिबंधित करने के भी इन पर आरोप लग चुके हैं।

डीयू के कॉलेजों में छात्रहित हाशिए पर आ गया है। स्टीफंस के प्रिंसिपल की कारगुजारी इसका नमूना है। यह सीधा-सीधा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है।

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