कांबली को थप्पड़ पड़ते ही भाग खड़े हुए थे सचिन

23 फरवरी, 1988 को संत जेवियर्स स्कूल के खिलाफ शारदाश्रम विद्यामंदिर स्कूल की तरफ से खेलते हुए बर्थ डे ब्वॉय सचिन तेंडुलकर और विनोद कांबली ने 664* रनों की वर्ल्ड रिकॉर्ड पार्टनरिशप की थी। यह बात तो लगभग सभी क्रिकेट प्रेमी जानते हैं, लेकिन यह पार्टनरशिप कितनी चतुराई और कोच के आदेशों को नजरअंदाज कर बनी थी, यह बात बहुत कम लोग ही जानते होंगे। इसके पीछे काफी रोचक किस्सा है, जिसके अंत में विनोद कांबली को थप्पड़ भी खाना पड़ा और सचिन चुपके से भाग खड़े हुए।

22 फरवरी को शुरू हुआ था मैच और 23 फरवरी को बना था रिकॉर्ड
22 फरवरी को मुंबई के आजाद मैदान पर खेले गए लॉर्ड हैरिस शील्ड टूर्नामेंट के सेमीफाइनल मैच में शारदाश्रम विद्यामंदिर स्कूल की टीम पहले बैटिंग करने उतरी, जिसके कप्तान सचिन तेंडुलकर थे। शुरुआत तो खराब रही और रूपक मलयेत और अतुल रानाडे का विकेट जल्दी गिर गया। इसके बाद तीसरे नंबर पर बैटिंग करने विनोद कांबली आए, जबकि चौथे नंबर पर सचिन तेंडुलकर आए। शुरुआती दो विकेट गिराने के बाद संत जेवियर्स स्कूल काफी जश्न मना रहा था, लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि अब जो उनके साथ होने वाला है, उसके बारे में तो वे कल्पना भी नहीं कर सकते थे।

मैच से पहले सचिन और कांबली ने खूब खाए थे बड़ा पाव
सचिन और कांबली ने मैच की पिछली रात को खूब बड़ा पाव खाए थे। उसकी ताकत उन्होंने मैच में दिखाई। दोनों ने मिलकर बॉलर्स की जमकर धुनाई की। मैदान के चारों तरफ शॉट लगाए। पहले दिन की खेल समाप्ति पर तेंडुलकर 192 रन पर नॉट आउट थे और कांबली 182 रन पर नॉट आउट थे। इसके बाद कोच रमाकांत अचरेकर ने सचिन से कहा कि अगले दिन सुबह पहली पारी घोषित हो जानी चाहिए। सचिन ने हामी भर दी। किसी काम की वजह से अचरेकर अगले दिन ग्राउंड पर नहीं पहुंचे। कप्तान सचिन ने इस मौके का फायदा उठाया और कांबली के साथ बैटिंग करने उतर गए।

सहायक कोच लक्ष्मण करते रहे इशारे
सहायक कोच लक्ष्मण चव्हाण बाउंड्री से दोनों बैट्समैन को पारी घोषित करने का इशारा करते रहे, लेकिन दोनों उस इशारे को जानबूझकर नजरअंदाज करते रहे। जब भी लक्ष्मण इशारा करते, सचिन कांबली से कहते कि उस तरफ देखना भी मत। वो क्या कहते हैं, सुनना भी मत, बस चुपचाप बैटिंग करते रहो। लक्ष्मण मैदान के चारों ओर घूम-घूमकर इशारा करते, लेकिन जिस ओर लक्ष्मण जाते, सचिन और कांबली अपना मुंह घुमा लेते। उस दिन जब लंच हुआ तब लक्ष्मण ने सचिन से कहा कि वे कोच अचरेकर से बात कर लें।

सचिन ने चतुराई से कांबली को फोन पकड़ा दिया
उस वक्त मोबाइल नहीं था। सचिन ने आजाद मैदान के पास में ही खाउ गली से अचरेकर को फोन किया और कहा, "सर स्कोर 700 रन के ऊपर जा चुका है और कांबली 349 रन पर बैटिंग कर रहा है। वह चाहता है कि वह 350 रन बनाए।" ऐसा कहते ही सचिन ने बहुत ही चतुराई से डरे हुए कांबली को फोन पकड़ा दिया। अचरेकर ने कांबली पर गुस्सा करते हुए आगे खेलने से साफ मना कर दिया और पारी घोषित करने के लिए कहा। कांबली इसलिए ज्यादा डरे हुए थे, क्योंकि उन्होंने पहले दिन कोच की बात नहीं मानी थी और ना ही उनकी आगे खेलने की कोई चाहत थी। खेलना तो सिर्फ सचिन ही चाहते थे। सचिन ने पारी की घोषणा कर दी, तब तक दोनों के बीच 664* रनों की पार्टनरशिप हो चुकी थी और शारदाश्रम विद्यामंदिर स्कूल का स्कोर 120 ओवर्स में 2 विकेट के नुकसान पर 748 रन हो चुका था। तेंडुलकर 326 रन पर नॉट आउट रहे।

सचिन चले गए दूसरा मैच खेलने
जिस वक्त यह मैच चल रहा था, उसी वक्त दूसरे ग्राउंड पर शारदाश्रम स्कूल का अंडर 15 का एक और मैच चल रहा था। अचरेकर ने फौरन सहायक कोच लक्ष्मण चव्हाण को कहा कि वे हर हाल में पहली पारी घोषित कर दें और सचिन को दूसरे मैच में बैटिंग करने के लिए भेज दें। सचिन ने वहां भी सेन्चुरी लगाई। वहीं, दूसरी तरफ जब सचिन दूसरे मैच में खेलने चले गए तो कमान विनोद कांबली के हाथों में आ गई। सचिन की अनुपस्थिति में टीम ने 10 खिलाड़ियों के साथ फील्डिंग की। कांबली ने मौके का फायदा उठाया और खुद बॉलिंग की कमान संभाली। कांबली ने उस समय के स्टार बॉलर्स की खूब नकल की और अलग-अलग एंगल से बॉलिंग की। इसका फायदा यह हुआ कि उन्होंने उस मैच में 6 विकेट लिए।



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