आपको भी कुछ सिखाती है राहुल राठौर की कहानी

राकेश वर्मा/ग्वालियर। गरीबों के लिए यूं तो तमाम योजनाएं चलतीं हैं परंतु सबसे बड़ी समस्या यह है कि गरीबों के जीवन स्तर को सुधारने के लिए कोई अभियान नहीं है। होता भी है तो गरीब वर्ग उसे अस्वीकार कर देता है, मुफ्तखोरी की लत उन्हें स्वाभिमानी नहीं बनने देती, लेकिन ग्वालियर के युवा इंजीनियर राहुल राठौर की सोशल इंजीनियरिंग यहां काम कर गई। वो और उसके दोस्त करीब 35 भिखारी बच्चों का एक स्कूल चला रहे हैं। बिना सरकारी मदद के और सबसे बड़ी बात यह कि बच्चे भी पड़ रहे हैं।

पांच महीने पहले 20 वर्षीय इंजीनियरिंग छात्र राहुल राठौर ने चौराहों पर भीख मांगने वाले बच्चों की तकलीफ देखी। तय किया कि इन्हें हर हाल में पढ़ाना है। समस्या यह थी कि पढ़ाएं कैसे, क्योंकि वो तो पढ़ना ही नहीं चाहते। कहते हैं पढ़लिखकर तुम जितना कमाते हो, उससे ज्यादा तो हम बिना पढ़े ही कमा लेते हैं। पढ़ जाएंगे तो सरकारी मदद नहीं मिलेगी। इसलिए अनपढ़ ही ठीक हैं।

राहुल ने एक ट्रिक यूज की। पहले खेलने के बहाने इन बच्चों से दोस्ती की। जब वे घुल-मिल गए तो उनसे पढ़ने को कहा। भैया का व्यवहार देखकर बच्चे भी तैयार हो गए। फिर क्या था, राहुल ने फूलबाग स्थित लक्ष्मीबाई समाधि स्थल के मैदान में दरी बिछाई और पढ़ाई शुरू कर दी।

बच्चे पढ़ने लगे तो स्कूल की चर्चा होने लगी। इस बीच राहुल के इंजीनियरिंग कर रहे दोस्त, कामकाजी युवक युवतियां और स्कूली छात्र भी जुड़ गए। उन्हें कॉपी-किताब के साथ बढ़िया नाश्ता भी मिलने लगा। बन गया यूथ पावर ग्रुप। आज ग्रुप के 45 लोग भीख मांगने वाले 35 बच्चों का जीवन संवारने में जुटे हैं।

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