गर्मियों मे इन बीमारियों से कैसे करे बचाव | Health Tips in Hindi

बीमारियां भी मौसम के अनुसार कम और ज्यादा फैलती हैं। कुछ बीमारियां ऐसी होती हैं जो ज्यादा बारिश होने पर फैलती हैं तो कुछ ऐसी होती हैं, जो चिलचिलाती धूप और चुभती गर्मी के कारण फैलती हैं। जैसे-जैसे पारा चढ़ता है और तेज लू चलने लगती है, वैसे ही इन बीमारियों का प्रकोप बढ़ने लगता है। गर्मियों में त्वचा से जुड़ी बीमारियां ज्यादा होती हैं। समय रहते सावधानी नहीं बरती जाए तो इसके परिणाम बहुत ही भयंकर हो सकते हैं। आइए, जानें कुछ ऐसी ही बीमारियों और उनसे बचने के उपायों के बारे में।

छोटी माता- छोटी माता को चिकनपॉक्स भी कहा जाता है। यह वेरीसेल्ला जोस्टर वायरस के संक्रमण से होने वाली बीमारी है। यह बहुत ही तेजी से फैलती है।
लक्षण- इसमें बुखार आ जाता है और शरीर पर दानें हो जाते हैं। उन पर तेज खुजली होती है। इसके अलावा, त्वचा में संक्रमण, निमोनिया और मस्तिष्क में सूजन भी चिकनपॉक्स के लक्षण हैं।

क्या करें बचने के लिए - बच्चों और युवाओं को इस बीमारी का खतरा सबसे ज्यादा रहता है। चिकनपॉक्स छूने से बहुत तेजी से फैलता है। चिकित्सक सलाह देते हैं कि इसके निवारण के लिए 12 से 15 महीने की उम्र के बीच बच्चों को चिकन पॉक्स का टीका और 4 से 6 वर्ष की उम्र के बीच दूसरा टीका लगवा लेना चाहिए।

टाइफाइड- टाइफाइड साल्मोनेला टाइफी नामक जीवाणु से होने वाला संक्रामक रोग है। बच्चों को वयस्कों की तुलना में टाइफाइड होने की अधिक संभावना होती है। यह रोग 2 साल की उम्र के बच्चों से लेकर किसी को भी हो सकता है।

लक्षण- बीमारी में लगातार बुखार रहना, भूख कम लगना, मुंह का स्वाद बिगड़ना, उल्टी होना और खांसी-जुकाम भी हो सकता है।

कारण- इस बुखार का कारण साल्मोनेला टाइफी नामक बैक्टीरिया का संक्रमण होता है। यह रोग आंतों, दिल, फेफड़ों, गुर्दें और मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव डाल सकता है।

पीलिया- पीलिया ऐसा रोग है जो एक विशेष प्रकार के वायरस से होता है। इसमें रोगी को पीला पेशाब आता है। उसके नाखून, त्वचा एवं आंखों का सफेद भाग पीला पड़ जाता है। बेहद कमजोरी महसूस होती है। जी मिचलाना, सिरदर्द, भूख न लगना आदि परेशानियां भी रहने लगती हैं।

कारण- यह एक प्रकार के वायरस से होने वाला रोग है। यह पहले लिवर में और वहां से सारे शरीर में फैल जाता है।

लक्षण:- मुंह, नाखून और पेशाब में पीलापन। भूख कम लगती है और जी मिचलाता है। कुछ मामलों में उल्टी भी हो जाती है। कभी पतले दस्त आते हैं, कभी पेट फूल जाता है और मल से काफी बदबू आती है। नब्ज धीमी गति से चलती है। रोगी को नींद नहीं आती और कमजोरी आ जाती है। रोग पुराना हो जाने पर शरीर में भयानक खुजली हो जाती है।

रोग से बचने के लिए क्या करें- पानी उबालकर पीना चाहिए। चलते-फिरते रहने से वायरस का दुष्प्रभाव लिवर पर अधिक पड़ता है। इसलिए रोगी को कम से कम चलना-फिरना चाहिए। इस रोग में लिवर कोशिकाओं में ग्लाइकोजन और रक्त प्रोटीन की मात्रा घट जाती है। इसलिए कोई हल्का प्रोटीन भोजन, जैसे मलाईरहित दूध या प्रोटीनेक्स आदि लेना चाहिए।

इस रोग से बचने के लिए- अपने हाथ थोड़ी-थोड़ी देर में धोते रहें। ऐसा करने से आप इन्फेकशन से दूर रह सकते हैं। खाना बनाते समय, खाना खाते समय और शौचालय के उपयोग के बाद साबुन से अपने हाथ धोएं। कच्चे फल और सब्जियां नहीं खाएं। गर्म खाना खाएं। घर की चीज़ों को साफ रखें।

मम्स- मम्स पेरोटिड ग्रंथियों में वायरल संक्रमण से होने के कारण होने वाली बीमारी है। ये ग्रंथियां लार बनाती हैं, जो चेहरे के दोनों तरफ कान के नीचे व जबड़े की हड्डी के नीचे स्थित होती हैं। यह बीमारी लार के जरिए और खांसने या छींकने से फैलती है। मम्स के वायरस से संक्रमित मरीज पेरोटिड ग्रंथि में सूजन शुरू होने के 7 दिन पहले और 7 दिन बाद तक संक्रमण फैला सकते हैं। मम्स को गलसुआ के नाम से भी जाना जाता हैं।

लक्षण- बुखार, कंपकपी, थकान और पेरोटिड ग्रंथि में दर्द व सूजन शुरुआती लक्षणों में शामिल हैं। कई बार सूजन सिर्फ एक तरफ की ग्रंथि में ही दिखाई देती है। रोटिड ग्रंथि में सूजन के कारण मरीज को मुंह खोलने, बोलने, खाने और पीने में तकलीफ होती है। मम्स से पीड़ित बच्चे कान और पेट दर्द की शिकायत करते हैं।

बचाव- मरीज़ को पर्याप्त मात्रा में पानी पिलाने की सलाह दी जाती है। फलों का रस नहीं देना चाहिए, क्योंकि इससे पेरोटिड ग्रंथि लार बनाने लगती है। इससे सूजन और दर्द, दोनों ही बढ़ जाते हैं। इससे बचाव के लिए एमएमआर टीके लगाए जाते हैं।

खसरा- खसरा श्वसन प्रणाली में वायरस, विशेष रूप से मोर्बिलीवायरस के जीन्स पैरामिक्सोवायरस के संक्रमण से होता है। खसरा बहुत ही संक्रामक रोग है। जो संक्रमित व्यक्ति के साथ एक ही घर में रहते हैं, वे इसके शिकार हो सकते हैं। यह संक्रमण औसतन 14 दिनों (6-19 दिनों तक) तक प्रभावी रहता है।
लक्षण- खसरा होने पर शरीर में टूटन, थकान, चिड़चिड़ापन होता है। धीरे-धीरे लाल रंग के दाने पूरे शरीर पर दिखाई पड़ने लगते हैं। बुखार 103 से 104 डिग्री तक हो सकता है। आंखों में लाली, सूजन, चिपचिपापन, खुजली, पानी निकलना और बेचैनी रहती है।

कैसे बचें इस बीमारी से - रोगी को रोज ताजे पानी से और बिना साबुन के आराम से नहलाएं। ढीले सूती सफेद कपड़े पहनाएं और उन्हें रोज बदलें। आम तौर पर सभी बच्चों को एमएमआर टीके लगाए जाते हैं, जिससे यह बीमारी जल्दी ठीक होती है।

health tips , prevention of disease 

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