Murthal University में हुआ Solar street lights Scam, रिकॉर्ड की फाइल गायब

मुरथल यूनिवर्सिटी में सोलर स्ट्रीट लाइट लगवाने के नाम पर एक बड़ा घोटाला सामने आया है दीनबंधु छोटूराम विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी यूनिवर्सिटी मुरथल में फाइलें चोरी करने का मामला पहला नहीं है। यहां जिस भी फाइल में गड़बड़ी होती है या तो वह पूरी फाइल गायब हो जाती है या उसमें से उन कागजात को गायब कर दिया जाता है, जिनसे गड़बड़ का खुलासा होने का डर रहता है। यूनिवर्सिटी से प्रमोशन बोर्ड की मीटिंग की फाइल तक चोरी हो चुकी है, जिससे प्रमोशन तीन साल तक अटके रहे थे। प्रो. टंकेश्वर कुमार, वीसी ने यह माना है कि यूनिवर्सिटी से काफी फाइलें गायब हैं, जिनके बारे में पता कराया जा रहा है।

यूनिवर्सिटी में कई फाइलें गायब हैं, जिनमें से सोलर स्ट्रीट लाइट लगवाने की फाइल भी है। इस कारण लग रहा है कि उसमें गड़बड़ी की गई है, जिसकी जांच कराने के लिए ही फाइल को तलाश कराया जा रहा है। फिलहाल नोटिस जारी किया गया है। उसके बाद कार्रवाई की जाएगी।

दीनबंधु छोटूराम विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी यूनिवर्सिटी मुरथल में बड़े-बड़े खेल सामने आ रहे है। जहां अब नया खेल सोलर स्ट्रीट लाइट लगवाने के नाम पर सामने आया है। यह सोलर स्ट्रीट लाइटें यूनिवर्सिटी में वर्ष 2015-16 में लगवाई गई थीं, जिन पर 18 लाख 93 हजार रुपये खर्च किया गया। उसके लिए ना रेट कांट्रेक्ट मांगा गया और ना कोई टेंडर छोड़ा गया, बल्कि स्ट्रीट लाइट ठीक कराने के की बात कहकर नई खरीदी र्गइं और उनमें भी खेल करने के लिए नियमों की पूरी धज्जियां उड़ाई गईं। स्ट्रीट लाइटें भी जहां 200 लगाई जानी थी, उनमें से भी कटौती करके गायब कर दी गईं। 

यह पूरा खेल सामने आया तो वीसी ने उसकी जांच कराने के लिए फाइल मांगी। इसमें सबसे बड़ा खुलासा यह हुआ है कि लाइट लगवाने की फाइल ही चोरी हो चुकी थी। उसमें केवल एक फाइल मिल सकी, जिसमें बिल भुगतान के लिए वाउचर रखे गए थे। वीसी की ओर से फाइल के बारे में जानकारी जुटाने को जिम्मेदारों को नोटिस जारी किया है, जिसके बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।

2015-16 में पास हुआ था प्रस्ताव
दीनबंधु छोटूराम विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी यूनिवर्सिटी मुरथल में 2015-16 में स्ट्रीट लाइट ठीक कराने का प्रस्ताव पास हुआ, लेकिन उस समय लाइटों को ठीक कराने की जगह नई सोलर स्ट्रीट लाइटें खरीद ली गईं, जिनकी संख्या 200 बताई गईं थीं। जिस कमेटी ने उन लाइटों को खरीदा था, उसमें तत्कालीन वरिष्ठ अधिकारी की पुत्रवधू को शामिल करके पूरी जिम्मेदारी सौंप दी गई। इस तरह पूरे खेल की शुरुआत की गई और 18 लाख 93 हजार रुपये से जिन लाइटों को खरीदा गया, उसके लिए ना कोई रेट कांट्रेक्ट मंगवाया गया तो ना कोई टेंडर छोड़ा गया। किसी को लाइट खरीदने के बारे में उस समय जानकारी नहीं दी गई, जबकि नियम के अनुसार यूनिवर्सिटी में दो लाख से ज्यादा का कोई काम कराना होता है तो उसका टेंडर छोड़ना जरूरी है। इतनी मोटी रकम खर्च करके खरीदी गई लाइटों को लगवाया गया और अब उनके खराब होने पर रिपेयरिंग के लिए फाइल चेक की गई तो पूरा खेल सामने आ गया।

मिले केवल बिल भुगतान के वाउचर
लाइटों की जांच कराई गई तो वह भी काफी कम मिली और लाइट लगवाने की पूरी फाइल रिकार्ड से पहले ही चोरी हो चुकी थी। वहां केवल बिल भुगतान के वाउचर मिल सके, जिस पर वीसी ने कड़ा रुख अपनाया है। वीसी ने फाइल को तलाश करने के लिए संबंधित ब्रांच के अधिकारियों को नोटिस जारी कर दिया है। उसके बाद भी फाइल नहीं मिलती है तो आगे की कार्रवाई की जाएगी।


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